गोपालगंज (बिहार)
आस्था, विश्वास और दृढ़ संकल्प का एक अनोखा उदाहरण इन दिनों जिले के भोरे थाना क्षेत्र से सामने आया है, जहां सिसई दक्षिण टोला के निवासी शशिकांत मिश्रा अपनी भक्ति और तपस्या के कारण लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं।
शशिकांत मिश्रा ने अपनी अटूट श्रद्धा का परिचय देते हुए कड़ी गर्मी और लू के बीच नंगे पांव 48 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर मां थावेवाली के दरबार में हाजिरी लगाई। उनकी इस कठिन तपस्या ने न केवल स्थानीय लोगों को बल्कि पूरे क्षेत्र को प्रेरित किया है।
🙏 1.25 लाख से ज्यादा हनुमान मंदिरों में कर चुके हैं दर्शन
शशिकांत मिश्रा का धार्मिक जीवन किसी साधना से कम नहीं है। वे अब तक देशभर के 1 लाख 25 हजार से अधिक छोटे-बड़े हनुमान मंदिरों में दर्शन कर चुके हैं।
उनकी यात्रा केवल बिहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने वाराणसी, जयपुर, दिल्ली, अहमदाबाद, देहरादून, गोरखपुर, लखनऊ, आगरा और जोधपुर जैसे बड़े शहरों में भी स्थित मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की है।
उनका कहना है कि
“हनुमान जी मेरे गुरु हैं, और उनकी कृपा से ही मैं यह सब कर पा रहा हूं।”
🔥 सपना बना आस्था की यात्रा का कारण
शशिकांत मिश्रा ने बताया कि 20 अप्रैल 2026 की रात उन्हें एक दिव्य सपना आया, जिसमें मां थावेवाली ने उन्हें अपने दरबार में आने का संकेत दिया।
इस आध्यात्मिक अनुभव के बाद उन्होंने बिना किसी देरी के 48 किलोमीटर पैदल चलने का संकल्प लिया।
चिलचिलाती धूप और तेज लू के बावजूद उन्होंने करीब 9 घंटे की लगातार यात्रा कर मंदिर पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना की और माता का आशीर्वाद प्राप्त किया।
🚶♂️ 8 वर्षों से नंगे पांव, लिया कठिन व्रत
शशिकांत पिछले 8 वर्षों से नंगे पांव रहकर जीवन जी रहे हैं। उन्होंने एक विशेष संकल्प भी लिया है—
- 4 जून 2022 से 4 जून 2026 तक वे चप्पल नहीं पहनेंगे
- इस चार साल की कठिन तपस्या के बाद
- 5 जून 2026 को पहली बार चप्पल धारण करेंगे
यह संकल्प उनकी श्रद्धा और आत्मनियंत्रण को दर्शाता है, जो आज के समय में बेहद दुर्लभ है।
✍️ 1 करोड़ बार ‘राम-राम’ लिखने का संकल्प
केवल यात्रा ही नहीं, बल्कि शशिकांत ने आध्यात्मिक साधना का एक और बड़ा लक्ष्य रखा है।
उन्होंने 2 वर्षों के भीतर 1 करोड़ बार ‘राम-राम’ लिखने का संकल्प लिया है, जिसे वे निरंतर पूरा करने में लगे हुए हैं।
यह संकल्प उनकी भक्ति की गहराई और आध्यात्मिक अनुशासन को दर्शाता है।
👨👩👧 परिवार के साथ भी था कार्यक्रम, फिर भी निकले अकेले
शशिकांत ने बताया कि पहले से ही 8 मई को परिवार के साथ थावे मंदिर जाने की योजना बनाई गई थी, जो उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की शादी की सालगिरह के अवसर पर तय थी।
लेकिन मां के सपने में बुलावे के बाद उन्होंने इंतजार नहीं किया और अकेले ही यात्रा पर निकल पड़े।
🌟 क्षेत्र में बन गए प्रेरणा का स्रोत
शशिकांत मिश्रा की यह अनोखी साधना और आस्था आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन चुकी है।
- लोग उनकी श्रद्धा की सराहना कर रहे हैं
- युवाओं के लिए वे प्रेरणा बन गए हैं
- धार्मिक समर्पण का एक जीवंत उदाहरण बन चुके हैं
उनकी यह यात्रा यह साबित करती है कि जब आस्था और संकल्प मजबूत हो, तो कोई भी कठिनाई रास्ता नहीं रोक सकती।
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🔚 Conclusion
शशिकांत मिश्रा की कहानी केवल एक व्यक्ति की धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि यह आस्था, त्याग और संकल्प की एक प्रेरणादायक मिसाल है। आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी मुश्किलों से घबरा जाते हैं, वहीं शशिकांत का यह समर्पण हमें सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा के आगे हर बाधा छोटी पड़ जाती है।
